चिट्ठियां और संवाद
दौर चिट्ठियों का अब नहीं रहा। अब कोई किसी को चिट्ठी नहीं लिखता, न ही कोई किसी की बातों को अब संजो कर रखता है। समय की गति ने संचार के साधनों को इतना तेज़ बना दिया है कि भावनाएँ भी अब त्वरित हो गई हैं। जहाँ पहले शब्दों को सोच-समझकर कागज़ पर उतारा जाता था, वहीं आज वे उँगलियों के स्पर्श मात्र से स्क्रीन पर आ जाते हैं और उतनी ही जल्दी गायब भी हो जाते हैं। चिट्ठियाँ केवल संवाद का माध्यम नहीं थीं, वे भावनाओं का संग्रह थीं। उनमें स्याही से अधिक दिल की गहराई होती थी। हर शब्द में प्रतीक्षा का दर्द, मिलन की आशा और अपनेपन की गर्माहट छिपी होती थी। एक चिट्ठी आने में कई दिन लग जाते थे, परन्तु उसके आने की खुशी किसी उत्सव से कम नहीं होती थी। लोग बार-बार उसे पढ़ते, सहेज कर रखते और कभी-कभी तो वर्षों बाद भी उसे खोलकर वही पुरानी अनुभूतियाँ जी लेते थे। आज के समय में संवाद के साधन अत्यंत उन्नत हो गए हैं। मोबाइल फोन, फेसबुक, ईमेल और सोशल मीडिया के अन्य साधनों ने दूरी को समाप्त कर दिया है। अब संदेश भेजने में एक क्षण भी नहीं लगता। परन्तु इस सहजता ने कहीं न कहीं संवाद की गहराई को कम कर दिया है। आज के संदेश ...