सरकारी स्कूल भी अच्छे होते हैं
उत्तर प्रदेश में एक और गंभीर समस्या है—छात्रों का विद्यालय छोड़ना। गरीबी, पारिवारिक दबाव, बाल श्रम और प्रारंभिक विवाह जैसे कारणों से अनेक बच्चे अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ देते हैं या उनका प्रवेश रहता है तो भी उनका नाता केवल परीक्षा से ही जुड़ पाता है, उनकी उपस्थिति कक्षाओं में संभव नहीं हो पाती है। ऐसे में जब विद्यालय में छात्रों की संख्या घटती है, तो सरकार द्वारा स्कूलों के विलय (मर्जर) जैसी नीतियाँ अपनाई जाती हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुँच और भी कठिन हो जाती है। कई बार बच्चों को दूरस्थ विद्यालयों में जाना पड़ता है, जो उनकी नियमित उपस्थिति में और भी बड़ी बाधा बनता है। इसके समानांतर समाज की मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। आज अधिकांश अभिभावक अंग्रेजी माध्यम, बड़ी इमारतों, बस सुविधा और आधुनिक तकनीक को ही गुणवत्ता का प्रतीक मानने लगे हैं। निजी विद्यालय इस मानसिकता को भली-भांति समझते हैं और उसी के अनुरूप अपनी छवि गढ़ते हैं। इसके विपरीत सरकारी विद्यालयों के पास न तो इस प्रकार का प्रचार-प्रसार करने के साधन होते हैं और न ही वे अपनी उपलब्धियों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पाते हैं। परिणामस्वरूप, उनकी छवि धीरे-धीरे कमजोर होती चली जाती है, भले ही वहाँ शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता कई गुना बेहतर क्यों न हो, वहां के शिक्षकों की योग्यता भले आयोग द्वारा चयनित हो। इस मानकों की ओर हमारे समाज का ध्यान नहीं जाता । वे केवल बाहरी चकाचौंध से स्कूलों का मूल्यांकन करते हैं। बावजूद इसके यह कहना गलत होगा कि सरकारी विद्यालय पूरी तरह असफल हो चुके हैं।
उत्तर प्रदेश में आज भी ऐसे सरकारी विद्यालय हैं, जहाँ से पढ़कर छात्र उच्च पदों तक पहुँच रहे हैं। हाल के वर्षों में सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कई सकारात्मक पहल भी की गई है : जैसे - विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं का विकास, नामांकन बढ़ाने के लिए उच्च शिक्षा में प्रवेश उत्सव अभियान और प्रारंभिक शिक्षा को सुदृढ़ करने के प्रयास। परीक्षा परिणामों में सुधार भी इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएँ, तो सरकारी विद्यालय अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर सकते हैं।
अब आवश्यकता इस बात की है कि इन समस्याओं का समाधान केवल नीतियों तक सीमित न रहकर व्यवहारिक स्तर पर भी दिखाई दे। सबसे पहले सरकारी विद्यालयों में जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था को सुदृढ़ करना होगा। शिक्षकों की नियमित उपस्थिति और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसके साथ ही विद्यालयों की आधारभूत संरचना में सुधार करना भी अत्यंत आवश्यक है, ताकि छात्र एक अनुकूल और प्रेरणादायक वातावरण में अध्ययन कर सकें। इसके अतिरिक्त शिक्षण के स्वरूप में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। आज के समय में केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता और व्यावहारिक शिक्षा पर भी ध्यान देना होगा। यदि सरकारी विद्यालय इन क्षेत्रों में आगे बढ़ते हैं, तो वे निजी विद्यालयों से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो सकते हैं। अभिभावकों और समाज की भागीदारी भी इस प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब तक समाज सरकारी विद्यालयों को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानेगा, तब तक वास्तविक सुधार संभव नहीं है। अभिभावक-शिक्षक संवाद, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और विद्यालय की गतिविधियों में जनसहयोग से एक सकारात्मक वातावरण निर्मित किया जा सकता है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि शिक्षा का मूल्य उसकी बाहरी चमक-दमक में नहीं, बल्कि उसके प्रभाव में निहित होता है। सरकारी विद्यालयों में आज भी वह सामर्थ्य है, जो समाज के हर वर्ग तक शिक्षा पहुँचाने का कार्य कर सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी दृष्टि को बदलें, नीतियों को प्रभावी बनाएं और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से सरकारी विद्यालयों को सशक्त करें। यदि ऐसा किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब सरकारी स्कूल एक बार फिर से गुणवत्ता, विश्वास और समानता के प्रतीक बनकर उभरेंगे।

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